Saturday, November 23, 2013

बी जे एम सी के भावी रिपोर्टर की डायरी

 

जाखौदा  स्थित बी एल एस  तकनीकी एवं प्रबंधन संस्थान के  पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के छात्र जिज्ञासु जोशी, हिमांशु , अनमोल और शिव शक्ति पांडे , कौस्तुभ , योगेश कुमार ने बीते दिनों दिल्ली से शिमला तक की यात्रा का सफ़र तय किया ।
जाखौदा में लम्बे समय तक रहने के कारण मन नहीं लग रहा था इसलिए नई  ऊर्जा हासिल करने  के लिए हम सभी दोस्तों ने शिमला जाने का मन बनाया । वैसे भी ग़ालिब ने खूब कहा है " सैर कर दुनिया  की  ग़ालिब जिंदगानी फिर कहाँ , जिंदगी गर भी रही तो फिर नौजवानी फिर कहाँ ? " मन में यही उम्मीद लिए हम सभी दोस्तों के साथ वीकेंड मनाने निकल पड़े । २८ अगस्त को हम दिल्ली से शिमला के लिए रवाना हुए । सबसे पहले ऑटो पकड़ कर हम सभी पुरानी  दिल्ली गए जहाँ से हम लोगो ने  ट्रेन से चंडीगढ़ और फिर शिमला तक का सफ़र पूरा किया ।  जैसे ही हम सभी स्टेशन पहुंचे तो पता चला  हमारी ट्रेन काफी लेट हैं तब हम लोग कुछ घंटे स्टेशन पर ही बैठने का फैसला किया । 
तकरीबन    पाँच घंटे बाद स्टेशन पर ट्रेन आयी।  लेकिन फिर भी शिमला जाने का जोश ठंडा नहीं  पड़ा । यही वजह थी कि ट्रेन के लम्बे   इंतजार  के  हमको थकावट   नहीं हुई । ट्रेन में बातें करते करते कब हमने चंडीगढ़ तक का  सफ़र तय कर लिया हमें पता ही नहीं चला । चंडीगढ़ पहुंचकर हमने एक ढाबे में खाना खाया । सुबह सुबह पनीर के पराठे , लस्सी ने दिल खुश कर दिया । इस खाने ने कृष्णा ढाबे के खाने को भी कहीं पीछे  छोड़  दिया । खाना खाने के बाद हम शिमला के लिए निकल पड़े । 
शिमला पहुँचने में हमें चार घंटे लगे । जैसे जैसे हम शिमला का सफ़र  तय करते जा रहे थे वैसे वैसे हवा में ठंडक  बढ़ती  जा रही थी । शिमला पहुचकर हमने विक्ट्री होटल में जाकर एक पैकेज लिया और फिर अगले दिन हमने मौज मस्ती करने का मन बनाया । वहां पहुँचने के बाद कुफ्रटी चार किलोमीटर  ऊपर  था । भारी  बारिश होने की  वजह से मार्ग  खराब था  । सड़क गड्ढो में थी या गड्ढे सड़क में इसका अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल हो चला था । कीचड़ ने हमारे रास्ते में बड़ी विकट  बाधा खड़ी कर दी इसी वजह से हम सभी को पहाडी घोड़ो की मदद से सवारी करने को मजबूर होना पड़ा । 
शिमला में माल रोड का नजारा देखने लायक था । यह बहुत खूबसूरत जगह है । जहाँ कोई वाहन नहीं चलता बस आप प्रकृति  की  सुंदरता का सच्चा एहसास यहाँ पर कर सकते हैं । हमारा झुण्ड रात को इस सड़क की सैर करने निकल पड़ा । कोहरे के कारण ठण्ड इस जगह में थी लेकिन सुरम्य वादियो में जाकर  जिस शांति का एहसास हमें हुआ उसके लिए हम बहादुरगढ़  में तो कम से कम तरस ही जाते  थे । ऐसा लग रहा था मानो शिमला को प्रकृति  ने अपने मुक्त हस्तो से सजाया हुआ है । 
दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में रहने के आदी हम सभी  हो गए थे इसी वजह से हम ठण्ड के कपडे ले जाना भूल गए थे लेकिन शिमला पहुंचकर हम सोच रहे थे हमको अपने अपने   ठन्डे कपडे साथ लेकर चलना चाहिए था  ।शिमला  पहुंचकर  वहाँ आने वाले पर्यटको से भी हमने अपना संवाद कायम किया । मीडिया के स्टूडेंट थे तो बातचीत तो होनी ही थी । लोगो ने कहा दिल्ली में काफी प्रदूषण है । लोगो की जिंदगी भागम भाग है । संवेदनाएं मर सी गई हैं लेकिन शिमला में जो बात है वो कहीं नहीं है । यह जगह स्वर्ग जैसी है । 
शिमला के बारे में उन्होंने बताया कि यहाँ का आदमी बहुत मेहनती है । पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है । पर्यटन उद्योग से राज्य को खासी आमदनी होती है । शिमला में लोग सुकून के साथ अपना समय बिताते हैं । शिमला के बाशिंदे हर किसी के साथ घुल मिल जाते है और लोगो की मदद करते हैं ऐसा मुझे महसूस हुआ । सच में यह हमारी यात्रा यादगार रही । अगली बार अगर यहाँ दुबारा जाने का मौका मिला तो मैं दुबारा यहाँ जाने की सोचूंगा क्युकि  शिमला सरीखे हिल स्टेशन का कोई सानी नहीं है । 

Friday, October 25, 2013

अखिलेश नही संभाल पा रहे उत्तर प्रदेश.....


डेढ़ वर्ष पहले जब उत्तर प्रदेश की सत्ता में समाजवादी पार्टी लौटी तो कुछ आशा जगी  थी। 15 मार्च 2012 को मुलायम सिंह यादव के स्थान पर उनके पुत्र अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की कमान सौंपी गयी। सरकार को इस बार स्पष्ट बहुमत भी मिला था लेकिन 18 महीने के शासन के बाद भी सरकार जनता की उम्मीदो पर खरी  नही उतर पार्इ। वही अखिलेश यादव  भी लोगों का विश्वास जीतने में भी नाकाम रहे है।

एक  मस्जिद  की बन रही अभेद  दीवार को कथित तौर पर गिरा देने की अपुष्ट खबर मिली। उससे सांप्रदायिक माहौल खराब हो जाने की वजह से 45 मिनट में दुर्गा शक्ति  नागपाल को निलंबित कर दिया। वही अखिलेश यादव की सरकार ने 15 दिन तक मुजफ्फरनगर में बढ़ रहे हिंसा  के सांप्रदायिक तनाव की अनदेखी करते रहे और चारो तरफ से अखिलेश यादव की सरकार सवालो के घेरे में है।

     प्रदेश में सांप्रदायिक घटनाएं होने लगी जिसने लोगो को हिला कर रख दिया। सांप्रदायिक घटनाएं प्रदेश में पिछले कर्इ वर्षो से नही हो पा रही थी वही अब शुरू होने लगी है। उत्तर प्रदेश में अभी तक सरकार के दिए हुए आंकड़े की ही बात करे तो मार्च 2012 में दिसंबर  तक 27 सांप्रदायिक घटनाएं हुर्इ थी। अगस्त तक 12 सांप्रदायिक घटनांए हो चुकी है कुल मिलाकर 39 घटनाएं हो चुकी है।

जहाँ उत्तर प्रदेश में देर रात में लोग घर से निकलने में डरने लगे है वहीँ  लड़कियां भी  दिन में सुरक्षित नही है। वही उत्तर प्रदेश में लूटपाट, डकेती, रेप, दंगे, तो अब  आम बात हो  गयी है।  अपहरण जैसी वारदातें  तो  अब आम बात हो गयी हैं वही अखबारे लाऊड स्पीकर बजाने से लेकर कुत्ते द्वारा बकरी को भी काट लेने से  आग भड़क जाती है।  वही मुलायम के राज में राज्य अपराध प्रदेश था अब अखिलेश के राज में राज्य को दंगा प्रदेश के नाम से पहचान मिल रही हैं

वोट की राजनीति में लगे सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में   बारहवी पास छात्रों को करोड़ों के लैपटॉप  वितरण कर रहे है। उन्होंने युवा वोट बनाने के साथ-साथ जाति पर भी राजनीति करने में कोर्इ कसर नही छोड़ रहे है। न जुमा का दिन ओर नही रोजा इफ्तार की पार्टी साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहल की।

9 सिंतबर को संवाददाताओं से बातचीत करने आये अखिलेश एक गोल सफेद जालीदार टोपी लगाए हुए थे। सदभाव स्थापित करने के एकतरफा दिखावटी   के प्रयास की भी तीखी  प्रतिक्रिया हो रही है। अगर टोपी लगाने से ही विश्वास लौटता है तो मुख्यमंत्री को तिलक भी लगाना चाहिए था। दोनो कामों का विश्वास लौटता। पहले मुलायम सिंह ने जिस तरह एक पक्ष का हौसला बढाया था तो उनके नाम के साथ मुल्ला  शब्द जोड़ा  गया। अब अखिल समाजवादी पार्टी के अखिलेश  ने समाजवादी पार्टी को  नमाजवादी पार्टी बना दिया।

प्रदेश में शासन व्यवस्था शुरू से ही लड़खड़ाने लगी है। इसका मुख्य कारण  है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस की कमान ऐसे लोगो के हाथ में दी गयी जिनमें योग्यता ही नही थी। डेढ़ साल के कार्यकाल में अखिलेश सरकार को लेकर धारणा यही बनी रही है। कि उसमें कर्इ पावर सेंटर है। जिनकी वजह से अखिलेश अपना सही निर्णय नही ले पाते।

 पत्रकारों से बातचीत  करते हुए अखिलेश हद  से ज्यादा दबाव में थे और उनके बराबर में खड़े आअज्म खान उनके जवाबो को सही कर रहे थे ।   राज्यपाल बी.एल जोशी ने अपनी रिर्पोर्ट में साफ लिखा है कि 10 दिन तक मुजफ्फरनगर सुलगता रहा। सरकार कुछ न कर सकी। सिर्फ तमाशा देखती रही। सरकार ने हर दर्जे की लापरवाही बरती । यह रोकने के लिए अखिलेश अपना निर्णय ले  लेते तो घटनाओं को रोकने में कामयाब हो सकते थे ।