Sunday, April 13, 2014

मोदी बनाम ऑल की लड़ाई में 2014


 शोले का मशहूर डायलॉग था जब रात को बच्चा रोता है तो माँ कहती है सो जा बेटा   नहीं तो गब्बर जाएगा। कुछ ऐसा ही जुमला नरेंद्र मोदी के बारे में अन्य राजनैतिक दलों के बीच इन दिनों चल रहा है।कांग्रेस हो, बसपा हो,या सपा हो सभी पार्टियों के सुप्रीमों अपने कार्यकर्ताओं  और नेताओं को यही  सलाह दे रहे है कि अगर लोकसभा चुनवों में कोई भी लापरबाही हुई तो सत्ता में मोदी जाएगा। ऐसा लगता है कि लड़ाई भातीय जनता पार्टी  से नही मोदी से है। 

          सियासत की बदली हुई तस्वीर में महामुकाबले की यही तस्वीर सबको नज़र रही है।  सोनिया, राहुल, मुलायम, मायानीतीश इन सभी के केवल दल बदले है  लेकिन सियासी निशाना सिर्फ है वो है नरेंद्र मोदी शायद इस  बात को  नरेंद्र मोदी भी जान गये है इसलिये मोदी ने अपनी रैलियों में अब नया ऐलान शुरु कर दिया है कि कमल को दिया गया हर वोट मोदी का वोट होगा 2014 की चुनावी बिसात के केंद्र में नरेंद्र मोदी हों तो हमले तो चौतरफा होंगे ही।       
दूसरों को नैतिकता का पाठ पढाने वाले अरविंद केजरीवाल को दागी नेता मुख्तार अंसारी के समर्थन से भी गुरेज नही है केजरीवाल ने कहा है कि वाराणसी में मोदी को हराने के लिए सबको मिलकर जोर लगाना होगा उनके इन इशारो से साफ लगता है  कि यह भी कहीं कहीं मोदी के लहर का असर है। समाजबादी पार्टी के नेता जी मुलायम सिंह यादव भी वाराणसी से 80 किलोमीटर दूर आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे है जिससे मोदी के प्रभाव को कम कर सके। इससे साफ जाहिर होता है कि  मोदी का डर तो नेता जी को भी है। माया हो या कांग्रेस सभी पार्टियां  गोधरा कांड जैसे मुददों पर  मोदी को घेरने में लगी हुई है। लेकिन विरोधियों के एकसुर से किए हमलो में मोदी का सिर्फ इतना कहना  है कि उनको दिया गया हर वोट किसी के खिलाफ ही वल्कि देश के विकास के लिए  दिया गया  वोट है और मोदी के प्रति जनता की लोकप्रियता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। 
सियासी मौसम का सबसे दिलचस्प मोड़ चुका है और तस्वीर है मोदी बनाम ऑल की जब भी ऐसा हुआ है। एक करिश्माई राजनैतिक परिवर्तन से देश गुजरा है। शायद विरोधी इस बात को समझ  गये है और ये देखना होगा कि जनता इस दिलचस्प लड़ाई में किसके एजेंडे को  वाजिब मानती है।

अटल की कला के आगे मोदी फेल

सभी लोग जानते होगे कि अपनी भाषण शैली के लिए मशहूर और शायद भारत के सबसे पॉपुलर नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों के लिए भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मशहूर रहे हैं.1996 में अटल ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अमेरिकी संसद में हिंदी में भाषण दिया. अटल बिहारी की यह भाषण शैली भाजपा के भी बहुत काम आई. कांग्रेस को किनारे कर पहली बार 5 सालों तक एक स्थिर सरकार दे पाने में सफल रहने में अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक समय भाजपा भारत की सबसे पॉपुलर पार्टी बन सकी थी. अब वापस वही पॉपुलरिटी भाजपा नरेंद्र मोदी को पीएम इन वेटिंग के रूप में चुनावी मैदान में उतारकर पाना चाहती है. नरेंद्र मोदी कई बार अटल जी का जिक्र भी अपने भाषणों में कर चुके हैं. यही नही अटल जी के साथ नरेंद्र मोदी के पोस्टर्स भी देखे जा सकते है।1998 के चुनावों में अटल जी और भाजपा की एक अलग ही लहर थी जो भाजपा के लिए जीत की लहर बनी. आज वह लहर मोदी लहर के रूप में एक बार फिर बह रही है लेकिन सौ टके का सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी का मुकाबला कर सकते हैं
मोदी और वाजपेयी जी में एक मात्र समानता यही है कि दोनों ही अपने भाषणों के लिए देश-विदेश में पॉपुलर हैं लेकिन दोनों की पॉपुलेरिटी अलग तरह की है. कैसे? आगे समझ जाएंगे.

एक चुनावी भाषण के दौरान मोदी के इस स्टेटमेंट पर ध्यान दें:
”मैं कामदार हूं, वे नामदार हैं. ऐसे बड़े नामदार एक कामदार से मुकाबला करना बुरा मानते हैं, खुद का अपमान मानते हैं”

इंटरनेट और मीडिया में मोदी के भाषण रिसर्च का विषय रहे हैं लेकिन अपने बहुत प्रभावी अंदाज के कारण नहीं बल्कि अपने बड़बोलेपन के कारण. इन्हीं रिसर्च रिपोर्टों की मानें तो आंकड़े कुछ इस तरह निकलते हैं:
-अपने 20 मिनट के भाषण में मोदी कम से कम 5356 शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनमें कम से कम 25 बार गुजरात का जिक्र जरूर होता है.
-मोदी द्वारा अब तक दिए कुल 68 भाषणों में 1335 बार गुजरात का जिक्र किया गया है.
- और तो और शुरुआत में तो अपने भाषणों के लिए गलत ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग के लिए भी मोदी की अच्छी-खासी हाय-तौबा मचाई गई. मोदी के कई भाषणों में ऐसी कई ऐतिहासिक बातें कही गईं जिनका इतिहास में या तो कोई जिक्र ही नहीं या वह तथ्य कुछ और था. जैसे:
मोदी के भाषणों के कुछ फैक्चुअल एरर्स
-बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय से संबधित भाषण (बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय है ही नहीं)
-श्यामा प्रसाद मुखर्जी (भाजपा के संस्थापक) को कांग्रेस का बताया
-सिकंदर को बिहार में हारने की बात कही (इतिहास के अनुसार सिकंदर कभी बिहार गया ही नहीं).
-चीन द्वारा अपने जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा के लिए खर्च किए जाने की बात कही जबकि चीन के आंकड़े कहते हैं वह अपनी जीडीपी का मात्र 3 प्रतिशत से कुछ अधिक ही खर्च करता है.


इसके अलावा 
-फैक्ट्स अक्सर गलत
-कोई प्रभावशाली अंदाज नहीं
-विरोधियों पर सीधा निशाना
-अपने तीखे तेवर के लिए हमेशा विरोधियों के निशाने पर
अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों की विशेषताएं
-प्रभावशाली अंदाज
-फैक्ट्स सही
-विरोधियों पर सीधा निशाना निशाना नहीं, चुटीला अंदाज
-विरोधी भी प्रशंसक में शामिल
तुलनात्मक तराजू पर अटल-मोदी
-मोदी के भाषण अपनी और अपने द्वारा गुजरात में किए विकास की तारीफ से ही शुरू और उसी पर खत्म होते हैं जबकि अटल जी के भाषणों में देश और विकास की बातें होती थीं.
-उनके भाषणों से ऐसा लगता है जैसे चुनावी लड़ाई भाजपा से कांग्रेस की नहीं बल्कि मोदी से कांग्रेस की हो.
-अटल जी ने अपने भाषणों में विरोधियों पर कभी सीधी चोट नहीं की. विरोधियों पर कटाक्ष वे भी करते थे लेकिन चुटकी लेने का अंदाज उनका कुछ ऐसा होता था कि अपने ही ऊपर कटाक्ष पर विरोधी हंस पड़ते थे. इसके ठीक विपरीत अपने भाषणों में कभी कांग्रेस को ‘खूनी पंजा’ तो कभी राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कहकर संबोधित करने के लिए नरेंद्र मोदी तीखे विरोध का सामना कर चुके हैं.हाल ही में उमा भारती ने कहा कि अटल जी एक पॉपुलर वक्ता थे इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन मोदी की रैली में लोग उनका भाषण सुनने नहीं बल्कि उन्हें जताने आते हैं कि वे मोदी के साथ हैं. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का मोदी के लिए एक स्टेटमेंट कुछ इस तरह है:
”सशक्त और फौलादी इरादों के साथ-साथ जिसके अंदर संवेदनशीलता है, ऐसा नेतृत्व अगर किसी के पास है तो वह केवल (भाजपा) भारतीय जनता पार्टी के पास है, और इस नेतृत्व का नाम है श्री नरेंद्र कुमार मोदी जिन्हें हम 2014 लोकसभा चुनाव में भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं

Friday, March 28, 2014

मोदी, लहर और भाजपा

ऐसा कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी से प्रधानमंत्री पद  के सबसे प्रबल उम्मीदबार नरेंद्र  मोदी की लेहर पूरे देश में है लेकिन अगर  ऐसा है तो क्या खुद भारतीय जनता पार्टी में इस लेहर का असर दिखाई दे रहा है और अगर पार्टी के बाहर की बात करें तो  गूगल हो या मीडिया हर तरफ मोदी ही छाये हुए है  यही  नही वो जहां भी जाते है उन्हें देखने और सुनने के लिये जनसैलाव उमर पड़ता है।
अगर इन दिनों पार्टी में  भीतरी कलह पर नजर डाले तो शायद मोदी की लेहर पार्टी के अंदर भी काम कर रही है। जिस तरह मोदी पार्टी में सत्ता के पायदान पर तेज़ी से चढ़े है और दूसरे नेता पायदान से नीचे  गिरे है इन नेताओं को मोदी से कोई न कोई शिकायत है।  जसबंत सिंह को बाडमेर का टिकट न देना  या लालकृष्ण आडवाणी को भोपाल की जगह गांधी नगर से ही चुनाव लड़ने पर मजबूर करना हो या फिर मुरली मनोहर जोशी को  वाराणसी की जगह कानपुर से टिकट देने की बात हो ऐसा लगता है सालों से लगे इन वरिस्ठ नेताओं के पार्टी में दिन पूरे हो गए है। जिस तरह नरेंद्र मोदी की पार्टी में पकड़ मजबूत होती जा रही है।  वैसे वैसे इन नेताओं की पार्टी में गिरफ्त कमजोर होती जा रही है।
दूसरी तरफ बचे खुचे बड़े नेता जिनमें राजनाथ सिंह और अरुण जेटली शामिल है जो कि नरेंद्र मोदी का हाथ थाम चुके है।  वो हर कदम पर मोदी के साथ है। लेकिन आडवाणी ने इस लेहर को रोकने की हर मुमकिन चाल चली लेकिन  मोदी के सामने उनकी  एक न चली और उन्हे खामोश ही रहना पड़ा।
पार्टी के अंदर युवा नेताओं और आम कार्यकर्ताओं की बात करें तो वह केवल मोदी का ही नाम ले रहे है उनके अंदर  जो एक नया जोश दिखाई दे रहा है वो शायद मोदी की लेहर का असर है ऐसा लगता है जैसे मोदी ने पार्टी की शाखाओ को एक नया जीवनदान दिया है। अगर मोदी के नेतृत्व में पार्टी के कर्ताधर्ता पार्टी में नई जान फूकना चाहते है तो शायद पूराने नेताओं को किनारे करना गलत नही माना जाएगा।
भाजपा पूरे दस साल से सत्ता से बाहर रही जिसके दौरान वे दो आम चुनाव हार चुके है अगर आम चुनाव जीतना  है तो पार्टी को नए सिरे से संभारने की जरुरत है जैसा कि मोदी करने में लगे हुए है।


Saturday, March 22, 2014

आडवाणी की नाराज़गी और भाजपा....







आम  चुनाव के निकट आते ही  भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर  संकट में घिरती  नज़र आ रही है | भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ  नेता लालकृष्ण आडवाणी इसकी वजह  समझे जा रहे है। किसी न किसी बात पर आडवाणी की नाराज़गी शायद पार्टी  के लिए नई अब नई  मुश्किलें  पैदा कर सकती है। उनके इस रवैये पर अब   विपक्ष भी   खूब चुटकी ले रहे हैं । इससे आम जनता में  भी भाजपा की छवि पर  असर पड़  सकता है क्योंकि देश भर में कांग्रेस विरोधी  लहर  का लाभ अगर किसी को मिलता  दिख  रहा है तो वह है भाजपा है जिसे मोदी अपनी रणनीतियों  के जरिए नये  रूप में ढाल  रहे है। 

पार्टी ने आडवाणी  को  गांधीनगर से  चुनाव लड़ने को कहा, जहां से आडवाणी 1991   से चुनाव जीतते आ रहे है  लेकिन आडवाणी गांधीनगर के बजाय किसी अन्य  सुरक्षित सीट की तलाश में जुटे हैं ।  भाजपा ने उनके नाम का ऐलान भी कर दिया था।  लेकिन वह चुनाव भोपाल से लड़ने के लिये अड़े हुए थे।  जहां शिवराज सिंह चौहान उनके करीबी सहयोगी माने जाते है लेकिन मोदी इस बात पर अड़े है कि आडवाणी को चुनाव गांधीनगर से लड़ना  चाहिए। उन्होंने  आश्वासन  दिया है कि उनको  पूरा सहयोग मिलेगा।  लेकिन आडवाणी का तर्क था कि अगर  मोदी और पार्टी  अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी पसंद की सीटो से चुनाव लड़ सकते है तो  वो अपनी अपनी पसंद से चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते?

यह पहला मौका नहीं है जब आडवाणी इस तरह  कोपभवन में है।  आडवाणी ने राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से इस्तीफा दे चुके थे लेकिन संघ के हस्तक्षेप ने उनको  कोई बड़ा फैसला लेने से रोक लिया था।  अब एक बार फिर आडवाणी मोदी को रोकने के लिए अपना हर दाव
  फ्रन्ट  फुट  खेलकर  आगे  आना चाहते है।  लेकिन आडवाणी ने ऐसा पहली बार  नही किया है।  इससे पहले कई बार वो अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके है। पिछले साल जब पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार  चुना तो उस समय भी आडवाणी को गुस्सा आया। मोदी एक समय आडवाणी के चेले  थे।और शायद आडवाणी को यह बात पची नही कि उनका चेला अब प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल  उम्मीदवार  है।

आडवाणी 7  रेसफोर्स की आखिरी जंग  लड़ने को तैयार है। गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के समय आडवाणी ने उनका बहुत साथ दिया था। यही नहीं २००२ में गोधरा के दंगो  बाद जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  ने राजधर्म न निभा पाने के लिए मोदी को निशाने पर लिया वहीं आडवाणी के कहने पर मोदी की कुर्सी सलामत रही थीं।आडवाणी इस समय खुद को तन्हा  महसूस कर रहे है। मोदी के नेतृत्व  में बीजेपी  2 72  सीट से  अगर सरकार  नहीं बना पायी तो गठबंधन की   राजनीती  में आडवाणी का ही सपना पूरा होगा।  उनकी मौजूदा नाराज़गी शायद उनकी आखिरी नाराज़गी है।

Saturday, February 22, 2014

क्यों डरबन में हिंसक हुए गांधी ?

दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने जीवन में कभी हिंसक हुए थे? क्या उन्होंने अपनी बात को मनवाने के लिए नैतिक रूप से हिंसा का सहारा नहीं लिया? उनके पुत्र हरिलाल गांधी की पूरी जिंदगी अपने पिता महात्मा गांधी के आदर्शों के खिलाफ विद्रोही तेवरों की वजह से फेमस रही. उनके लिए कभी भी महात्मा गांधी के आदर्श एक प्रेरक शक्ति नहीं रहे बल्कि वह स्वयं इसे अपनी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा रुकावट मानते थे.
पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अद्भुत और चमत्कारिक व्यक्तित्व माना जाता है. सादगी और सहजता के साथ उन्होंने किस तरीके से भारत को सैकड़ों साल पुरानी अंग्रेजी जकड़न से मुक्त कराया. उनके अमिट विचार जीवनभर उनके और समर्थकों के लिए जीवनदायिनी रहे. इसके बावजूद भी वह कहीं ना कहीं पारिवारिक विफलता से क्षुब्ध रहे. महात्मा गांधी जिन्होंने पूरे देश की आत्मा में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाया उन्हें जीवन भर अपने बेटे की सोच को बदलने में कामयाबी नहीं मिल सकी. बल्कि उनके बेटे ने ही विद्रोही होकर अपने पिता को नीचा दिखाने के लिए धर्म परिवर्तन तक कर लिया.
महान पिता के खिलाफ बेटे के विद्रोही तेवर आज भी लोगों को हैरान करते हैं. जब इन दोनों (महात्मा गांधी और हरिलाल) के रिश्तों के बारे में लोग पढ़ते हैं तो उनका विवेक यह सवाल पूछने के लिए विवश करता है कि आखिर क्यों एक बेटा अपने जीते जी, सदैव अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करते हुए, विषवमन करता रहा. आखिर क्या कारण रहे कि हरिलाल गांधी समय के साथ-साथ विद्रोह की गिरफ्त में और अधिक तेजी से जाते रहे और कभी वापस मुड़ने का प्रयास नहीं किया?
गांधी की विफलता तब और बढ़ जाती है जब पिता और पुत्र के बीच पनपती कड़वाहट में महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी पिसती रहती हैं. वैसे कस्तूरबा गांधी की पीड़ा कहीं ना कहीं गांधी परिवार में सबसे ज्यादा थी. गांधी जी के सत्य और अनुशासन के सिद्धांत को तो दुनिया भी सलाम करती है लेकिन गांधी जी का एक ऐसा सिद्धांत है जिस पर दुनिया कभी एकमत नहीं हो पाई है और वह है ब्रह्मचर्य का सिद्धांत. कई लोग मानते हैं कि गांधी जी का अपने जीवन में ब्रह्मचर्य को अपनाने का फैसला ‘बा’ यानि कस्तूरबा गांधी के लिए बेहद कठिन और पीड़ादायक रहा. यही नहीं उनके कड़े नियम उनके बच्चों सहित उनकी पत्नी के लिए पीड़ादायक थे. पत्नी होने की वजह से कस्तूरबा गांधी ने इसका कभी विरोध नहीं किया लेकिन उनके बच्चों में हरिलाल ने इसका पुरजोर विरोध किया
महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा गांधी के बारे में कुछ अनछुए पहलू उजागर किए थे जिसमें से एक घटना कुछ यूं है………….
बकौल महात्मा गांधी “जब मैं दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रहता था. उस समय मेरे साथ एक क्रिश्चियन क्लर्क भी रहता था जिसका जन्म अछूत परिवार में हुआ था. जिस घर में मैं रहता था वह घर पूरी तरह से वेस्टर्न मॉडल पर आधारित था. इसमें हर रूम के लिए अलग-अलग बाथरूम थे जिसकी गंदगी नौकर साफ करते थे. महात्मा गांधी के अनुसार तब खुद और उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी ने अपनी-अपनी गंदगी साफ की. लेकिन क्रिश्चियन क्लर्क चूंकि वहां नया व्यक्ति था इसलिए स्वयं महात्मा गांधी और उनकी पत्नी उस क्लर्क के बेडरूम तथा लैट्रिन पॉट की भी साफ-सफाई किया करते थे. उसी दौरान सफाई करते समय कस्तूरबा और मोहनदास गंदगी पर गिर गए थे. तब गांधी, कस्तूरबा को उस गंदगी से खींचकर बाहर लाए और इसी बीच उनके दर्मियान झड़प भी हुई. आवेश में महात्मा ने ‘बा’ को छोड़ देने की बात की हालांकि बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ.


Saturday, November 23, 2013

बी जे एम सी के भावी रिपोर्टर की डायरी

 

जाखौदा  स्थित बी एल एस  तकनीकी एवं प्रबंधन संस्थान के  पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के छात्र जिज्ञासु जोशी, हिमांशु , अनमोल और शिव शक्ति पांडे , कौस्तुभ , योगेश कुमार ने बीते दिनों दिल्ली से शिमला तक की यात्रा का सफ़र तय किया ।
जाखौदा में लम्बे समय तक रहने के कारण मन नहीं लग रहा था इसलिए नई  ऊर्जा हासिल करने  के लिए हम सभी दोस्तों ने शिमला जाने का मन बनाया । वैसे भी ग़ालिब ने खूब कहा है " सैर कर दुनिया  की  ग़ालिब जिंदगानी फिर कहाँ , जिंदगी गर भी रही तो फिर नौजवानी फिर कहाँ ? " मन में यही उम्मीद लिए हम सभी दोस्तों के साथ वीकेंड मनाने निकल पड़े । २८ अगस्त को हम दिल्ली से शिमला के लिए रवाना हुए । सबसे पहले ऑटो पकड़ कर हम सभी पुरानी  दिल्ली गए जहाँ से हम लोगो ने  ट्रेन से चंडीगढ़ और फिर शिमला तक का सफ़र पूरा किया ।  जैसे ही हम सभी स्टेशन पहुंचे तो पता चला  हमारी ट्रेन काफी लेट हैं तब हम लोग कुछ घंटे स्टेशन पर ही बैठने का फैसला किया । 
तकरीबन    पाँच घंटे बाद स्टेशन पर ट्रेन आयी।  लेकिन फिर भी शिमला जाने का जोश ठंडा नहीं  पड़ा । यही वजह थी कि ट्रेन के लम्बे   इंतजार  के  हमको थकावट   नहीं हुई । ट्रेन में बातें करते करते कब हमने चंडीगढ़ तक का  सफ़र तय कर लिया हमें पता ही नहीं चला । चंडीगढ़ पहुंचकर हमने एक ढाबे में खाना खाया । सुबह सुबह पनीर के पराठे , लस्सी ने दिल खुश कर दिया । इस खाने ने कृष्णा ढाबे के खाने को भी कहीं पीछे  छोड़  दिया । खाना खाने के बाद हम शिमला के लिए निकल पड़े । 
शिमला पहुँचने में हमें चार घंटे लगे । जैसे जैसे हम शिमला का सफ़र  तय करते जा रहे थे वैसे वैसे हवा में ठंडक  बढ़ती  जा रही थी । शिमला पहुचकर हमने विक्ट्री होटल में जाकर एक पैकेज लिया और फिर अगले दिन हमने मौज मस्ती करने का मन बनाया । वहां पहुँचने के बाद कुफ्रटी चार किलोमीटर  ऊपर  था । भारी  बारिश होने की  वजह से मार्ग  खराब था  । सड़क गड्ढो में थी या गड्ढे सड़क में इसका अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल हो चला था । कीचड़ ने हमारे रास्ते में बड़ी विकट  बाधा खड़ी कर दी इसी वजह से हम सभी को पहाडी घोड़ो की मदद से सवारी करने को मजबूर होना पड़ा । 
शिमला में माल रोड का नजारा देखने लायक था । यह बहुत खूबसूरत जगह है । जहाँ कोई वाहन नहीं चलता बस आप प्रकृति  की  सुंदरता का सच्चा एहसास यहाँ पर कर सकते हैं । हमारा झुण्ड रात को इस सड़क की सैर करने निकल पड़ा । कोहरे के कारण ठण्ड इस जगह में थी लेकिन सुरम्य वादियो में जाकर  जिस शांति का एहसास हमें हुआ उसके लिए हम बहादुरगढ़  में तो कम से कम तरस ही जाते  थे । ऐसा लग रहा था मानो शिमला को प्रकृति  ने अपने मुक्त हस्तो से सजाया हुआ है । 
दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में रहने के आदी हम सभी  हो गए थे इसी वजह से हम ठण्ड के कपडे ले जाना भूल गए थे लेकिन शिमला पहुंचकर हम सोच रहे थे हमको अपने अपने   ठन्डे कपडे साथ लेकर चलना चाहिए था  ।शिमला  पहुंचकर  वहाँ आने वाले पर्यटको से भी हमने अपना संवाद कायम किया । मीडिया के स्टूडेंट थे तो बातचीत तो होनी ही थी । लोगो ने कहा दिल्ली में काफी प्रदूषण है । लोगो की जिंदगी भागम भाग है । संवेदनाएं मर सी गई हैं लेकिन शिमला में जो बात है वो कहीं नहीं है । यह जगह स्वर्ग जैसी है । 
शिमला के बारे में उन्होंने बताया कि यहाँ का आदमी बहुत मेहनती है । पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है । पर्यटन उद्योग से राज्य को खासी आमदनी होती है । शिमला में लोग सुकून के साथ अपना समय बिताते हैं । शिमला के बाशिंदे हर किसी के साथ घुल मिल जाते है और लोगो की मदद करते हैं ऐसा मुझे महसूस हुआ । सच में यह हमारी यात्रा यादगार रही । अगली बार अगर यहाँ दुबारा जाने का मौका मिला तो मैं दुबारा यहाँ जाने की सोचूंगा क्युकि  शिमला सरीखे हिल स्टेशन का कोई सानी नहीं है । 

Friday, October 25, 2013

अखिलेश नही संभाल पा रहे उत्तर प्रदेश.....


डेढ़ वर्ष पहले जब उत्तर प्रदेश की सत्ता में समाजवादी पार्टी लौटी तो कुछ आशा जगी  थी। 15 मार्च 2012 को मुलायम सिंह यादव के स्थान पर उनके पुत्र अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की कमान सौंपी गयी। सरकार को इस बार स्पष्ट बहुमत भी मिला था लेकिन 18 महीने के शासन के बाद भी सरकार जनता की उम्मीदो पर खरी  नही उतर पार्इ। वही अखिलेश यादव  भी लोगों का विश्वास जीतने में भी नाकाम रहे है।

एक  मस्जिद  की बन रही अभेद  दीवार को कथित तौर पर गिरा देने की अपुष्ट खबर मिली। उससे सांप्रदायिक माहौल खराब हो जाने की वजह से 45 मिनट में दुर्गा शक्ति  नागपाल को निलंबित कर दिया। वही अखिलेश यादव की सरकार ने 15 दिन तक मुजफ्फरनगर में बढ़ रहे हिंसा  के सांप्रदायिक तनाव की अनदेखी करते रहे और चारो तरफ से अखिलेश यादव की सरकार सवालो के घेरे में है।

     प्रदेश में सांप्रदायिक घटनाएं होने लगी जिसने लोगो को हिला कर रख दिया। सांप्रदायिक घटनाएं प्रदेश में पिछले कर्इ वर्षो से नही हो पा रही थी वही अब शुरू होने लगी है। उत्तर प्रदेश में अभी तक सरकार के दिए हुए आंकड़े की ही बात करे तो मार्च 2012 में दिसंबर  तक 27 सांप्रदायिक घटनाएं हुर्इ थी। अगस्त तक 12 सांप्रदायिक घटनांए हो चुकी है कुल मिलाकर 39 घटनाएं हो चुकी है।

जहाँ उत्तर प्रदेश में देर रात में लोग घर से निकलने में डरने लगे है वहीँ  लड़कियां भी  दिन में सुरक्षित नही है। वही उत्तर प्रदेश में लूटपाट, डकेती, रेप, दंगे, तो अब  आम बात हो  गयी है।  अपहरण जैसी वारदातें  तो  अब आम बात हो गयी हैं वही अखबारे लाऊड स्पीकर बजाने से लेकर कुत्ते द्वारा बकरी को भी काट लेने से  आग भड़क जाती है।  वही मुलायम के राज में राज्य अपराध प्रदेश था अब अखिलेश के राज में राज्य को दंगा प्रदेश के नाम से पहचान मिल रही हैं

वोट की राजनीति में लगे सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में   बारहवी पास छात्रों को करोड़ों के लैपटॉप  वितरण कर रहे है। उन्होंने युवा वोट बनाने के साथ-साथ जाति पर भी राजनीति करने में कोर्इ कसर नही छोड़ रहे है। न जुमा का दिन ओर नही रोजा इफ्तार की पार्टी साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहल की।

9 सिंतबर को संवाददाताओं से बातचीत करने आये अखिलेश एक गोल सफेद जालीदार टोपी लगाए हुए थे। सदभाव स्थापित करने के एकतरफा दिखावटी   के प्रयास की भी तीखी  प्रतिक्रिया हो रही है। अगर टोपी लगाने से ही विश्वास लौटता है तो मुख्यमंत्री को तिलक भी लगाना चाहिए था। दोनो कामों का विश्वास लौटता। पहले मुलायम सिंह ने जिस तरह एक पक्ष का हौसला बढाया था तो उनके नाम के साथ मुल्ला  शब्द जोड़ा  गया। अब अखिल समाजवादी पार्टी के अखिलेश  ने समाजवादी पार्टी को  नमाजवादी पार्टी बना दिया।

प्रदेश में शासन व्यवस्था शुरू से ही लड़खड़ाने लगी है। इसका मुख्य कारण  है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस की कमान ऐसे लोगो के हाथ में दी गयी जिनमें योग्यता ही नही थी। डेढ़ साल के कार्यकाल में अखिलेश सरकार को लेकर धारणा यही बनी रही है। कि उसमें कर्इ पावर सेंटर है। जिनकी वजह से अखिलेश अपना सही निर्णय नही ले पाते।

 पत्रकारों से बातचीत  करते हुए अखिलेश हद  से ज्यादा दबाव में थे और उनके बराबर में खड़े आअज्म खान उनके जवाबो को सही कर रहे थे ।   राज्यपाल बी.एल जोशी ने अपनी रिर्पोर्ट में साफ लिखा है कि 10 दिन तक मुजफ्फरनगर सुलगता रहा। सरकार कुछ न कर सकी। सिर्फ तमाशा देखती रही। सरकार ने हर दर्जे की लापरवाही बरती । यह रोकने के लिए अखिलेश अपना निर्णय ले  लेते तो घटनाओं को रोकने में कामयाब हो सकते थे ।