Friday, March 28, 2014

मोदी, लहर और भाजपा

ऐसा कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी से प्रधानमंत्री पद  के सबसे प्रबल उम्मीदबार नरेंद्र  मोदी की लेहर पूरे देश में है लेकिन अगर  ऐसा है तो क्या खुद भारतीय जनता पार्टी में इस लेहर का असर दिखाई दे रहा है और अगर पार्टी के बाहर की बात करें तो  गूगल हो या मीडिया हर तरफ मोदी ही छाये हुए है  यही  नही वो जहां भी जाते है उन्हें देखने और सुनने के लिये जनसैलाव उमर पड़ता है।
अगर इन दिनों पार्टी में  भीतरी कलह पर नजर डाले तो शायद मोदी की लेहर पार्टी के अंदर भी काम कर रही है। जिस तरह मोदी पार्टी में सत्ता के पायदान पर तेज़ी से चढ़े है और दूसरे नेता पायदान से नीचे  गिरे है इन नेताओं को मोदी से कोई न कोई शिकायत है।  जसबंत सिंह को बाडमेर का टिकट न देना  या लालकृष्ण आडवाणी को भोपाल की जगह गांधी नगर से ही चुनाव लड़ने पर मजबूर करना हो या फिर मुरली मनोहर जोशी को  वाराणसी की जगह कानपुर से टिकट देने की बात हो ऐसा लगता है सालों से लगे इन वरिस्ठ नेताओं के पार्टी में दिन पूरे हो गए है। जिस तरह नरेंद्र मोदी की पार्टी में पकड़ मजबूत होती जा रही है।  वैसे वैसे इन नेताओं की पार्टी में गिरफ्त कमजोर होती जा रही है।
दूसरी तरफ बचे खुचे बड़े नेता जिनमें राजनाथ सिंह और अरुण जेटली शामिल है जो कि नरेंद्र मोदी का हाथ थाम चुके है।  वो हर कदम पर मोदी के साथ है। लेकिन आडवाणी ने इस लेहर को रोकने की हर मुमकिन चाल चली लेकिन  मोदी के सामने उनकी  एक न चली और उन्हे खामोश ही रहना पड़ा।
पार्टी के अंदर युवा नेताओं और आम कार्यकर्ताओं की बात करें तो वह केवल मोदी का ही नाम ले रहे है उनके अंदर  जो एक नया जोश दिखाई दे रहा है वो शायद मोदी की लेहर का असर है ऐसा लगता है जैसे मोदी ने पार्टी की शाखाओ को एक नया जीवनदान दिया है। अगर मोदी के नेतृत्व में पार्टी के कर्ताधर्ता पार्टी में नई जान फूकना चाहते है तो शायद पूराने नेताओं को किनारे करना गलत नही माना जाएगा।
भाजपा पूरे दस साल से सत्ता से बाहर रही जिसके दौरान वे दो आम चुनाव हार चुके है अगर आम चुनाव जीतना  है तो पार्टी को नए सिरे से संभारने की जरुरत है जैसा कि मोदी करने में लगे हुए है।


Saturday, March 22, 2014

आडवाणी की नाराज़गी और भाजपा....







आम  चुनाव के निकट आते ही  भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर  संकट में घिरती  नज़र आ रही है | भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ  नेता लालकृष्ण आडवाणी इसकी वजह  समझे जा रहे है। किसी न किसी बात पर आडवाणी की नाराज़गी शायद पार्टी  के लिए नई अब नई  मुश्किलें  पैदा कर सकती है। उनके इस रवैये पर अब   विपक्ष भी   खूब चुटकी ले रहे हैं । इससे आम जनता में  भी भाजपा की छवि पर  असर पड़  सकता है क्योंकि देश भर में कांग्रेस विरोधी  लहर  का लाभ अगर किसी को मिलता  दिख  रहा है तो वह है भाजपा है जिसे मोदी अपनी रणनीतियों  के जरिए नये  रूप में ढाल  रहे है। 

पार्टी ने आडवाणी  को  गांधीनगर से  चुनाव लड़ने को कहा, जहां से आडवाणी 1991   से चुनाव जीतते आ रहे है  लेकिन आडवाणी गांधीनगर के बजाय किसी अन्य  सुरक्षित सीट की तलाश में जुटे हैं ।  भाजपा ने उनके नाम का ऐलान भी कर दिया था।  लेकिन वह चुनाव भोपाल से लड़ने के लिये अड़े हुए थे।  जहां शिवराज सिंह चौहान उनके करीबी सहयोगी माने जाते है लेकिन मोदी इस बात पर अड़े है कि आडवाणी को चुनाव गांधीनगर से लड़ना  चाहिए। उन्होंने  आश्वासन  दिया है कि उनको  पूरा सहयोग मिलेगा।  लेकिन आडवाणी का तर्क था कि अगर  मोदी और पार्टी  अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी पसंद की सीटो से चुनाव लड़ सकते है तो  वो अपनी अपनी पसंद से चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते?

यह पहला मौका नहीं है जब आडवाणी इस तरह  कोपभवन में है।  आडवाणी ने राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से इस्तीफा दे चुके थे लेकिन संघ के हस्तक्षेप ने उनको  कोई बड़ा फैसला लेने से रोक लिया था।  अब एक बार फिर आडवाणी मोदी को रोकने के लिए अपना हर दाव
  फ्रन्ट  फुट  खेलकर  आगे  आना चाहते है।  लेकिन आडवाणी ने ऐसा पहली बार  नही किया है।  इससे पहले कई बार वो अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके है। पिछले साल जब पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार  चुना तो उस समय भी आडवाणी को गुस्सा आया। मोदी एक समय आडवाणी के चेले  थे।और शायद आडवाणी को यह बात पची नही कि उनका चेला अब प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल  उम्मीदवार  है।

आडवाणी 7  रेसफोर्स की आखिरी जंग  लड़ने को तैयार है। गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के समय आडवाणी ने उनका बहुत साथ दिया था। यही नहीं २००२ में गोधरा के दंगो  बाद जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  ने राजधर्म न निभा पाने के लिए मोदी को निशाने पर लिया वहीं आडवाणी के कहने पर मोदी की कुर्सी सलामत रही थीं।आडवाणी इस समय खुद को तन्हा  महसूस कर रहे है। मोदी के नेतृत्व  में बीजेपी  2 72  सीट से  अगर सरकार  नहीं बना पायी तो गठबंधन की   राजनीती  में आडवाणी का ही सपना पूरा होगा।  उनकी मौजूदा नाराज़गी शायद उनकी आखिरी नाराज़गी है।