Sunday, April 13, 2014

मोदी बनाम ऑल की लड़ाई में 2014


 शोले का मशहूर डायलॉग था जब रात को बच्चा रोता है तो माँ कहती है सो जा बेटा   नहीं तो गब्बर जाएगा। कुछ ऐसा ही जुमला नरेंद्र मोदी के बारे में अन्य राजनैतिक दलों के बीच इन दिनों चल रहा है।कांग्रेस हो, बसपा हो,या सपा हो सभी पार्टियों के सुप्रीमों अपने कार्यकर्ताओं  और नेताओं को यही  सलाह दे रहे है कि अगर लोकसभा चुनवों में कोई भी लापरबाही हुई तो सत्ता में मोदी जाएगा। ऐसा लगता है कि लड़ाई भातीय जनता पार्टी  से नही मोदी से है। 

          सियासत की बदली हुई तस्वीर में महामुकाबले की यही तस्वीर सबको नज़र रही है।  सोनिया, राहुल, मुलायम, मायानीतीश इन सभी के केवल दल बदले है  लेकिन सियासी निशाना सिर्फ है वो है नरेंद्र मोदी शायद इस  बात को  नरेंद्र मोदी भी जान गये है इसलिये मोदी ने अपनी रैलियों में अब नया ऐलान शुरु कर दिया है कि कमल को दिया गया हर वोट मोदी का वोट होगा 2014 की चुनावी बिसात के केंद्र में नरेंद्र मोदी हों तो हमले तो चौतरफा होंगे ही।       
दूसरों को नैतिकता का पाठ पढाने वाले अरविंद केजरीवाल को दागी नेता मुख्तार अंसारी के समर्थन से भी गुरेज नही है केजरीवाल ने कहा है कि वाराणसी में मोदी को हराने के लिए सबको मिलकर जोर लगाना होगा उनके इन इशारो से साफ लगता है  कि यह भी कहीं कहीं मोदी के लहर का असर है। समाजबादी पार्टी के नेता जी मुलायम सिंह यादव भी वाराणसी से 80 किलोमीटर दूर आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे है जिससे मोदी के प्रभाव को कम कर सके। इससे साफ जाहिर होता है कि  मोदी का डर तो नेता जी को भी है। माया हो या कांग्रेस सभी पार्टियां  गोधरा कांड जैसे मुददों पर  मोदी को घेरने में लगी हुई है। लेकिन विरोधियों के एकसुर से किए हमलो में मोदी का सिर्फ इतना कहना  है कि उनको दिया गया हर वोट किसी के खिलाफ ही वल्कि देश के विकास के लिए  दिया गया  वोट है और मोदी के प्रति जनता की लोकप्रियता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। 
सियासी मौसम का सबसे दिलचस्प मोड़ चुका है और तस्वीर है मोदी बनाम ऑल की जब भी ऐसा हुआ है। एक करिश्माई राजनैतिक परिवर्तन से देश गुजरा है। शायद विरोधी इस बात को समझ  गये है और ये देखना होगा कि जनता इस दिलचस्प लड़ाई में किसके एजेंडे को  वाजिब मानती है।

अटल की कला के आगे मोदी फेल

सभी लोग जानते होगे कि अपनी भाषण शैली के लिए मशहूर और शायद भारत के सबसे पॉपुलर नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों के लिए भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मशहूर रहे हैं.1996 में अटल ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अमेरिकी संसद में हिंदी में भाषण दिया. अटल बिहारी की यह भाषण शैली भाजपा के भी बहुत काम आई. कांग्रेस को किनारे कर पहली बार 5 सालों तक एक स्थिर सरकार दे पाने में सफल रहने में अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक समय भाजपा भारत की सबसे पॉपुलर पार्टी बन सकी थी. अब वापस वही पॉपुलरिटी भाजपा नरेंद्र मोदी को पीएम इन वेटिंग के रूप में चुनावी मैदान में उतारकर पाना चाहती है. नरेंद्र मोदी कई बार अटल जी का जिक्र भी अपने भाषणों में कर चुके हैं. यही नही अटल जी के साथ नरेंद्र मोदी के पोस्टर्स भी देखे जा सकते है।1998 के चुनावों में अटल जी और भाजपा की एक अलग ही लहर थी जो भाजपा के लिए जीत की लहर बनी. आज वह लहर मोदी लहर के रूप में एक बार फिर बह रही है लेकिन सौ टके का सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी का मुकाबला कर सकते हैं
मोदी और वाजपेयी जी में एक मात्र समानता यही है कि दोनों ही अपने भाषणों के लिए देश-विदेश में पॉपुलर हैं लेकिन दोनों की पॉपुलेरिटी अलग तरह की है. कैसे? आगे समझ जाएंगे.

एक चुनावी भाषण के दौरान मोदी के इस स्टेटमेंट पर ध्यान दें:
”मैं कामदार हूं, वे नामदार हैं. ऐसे बड़े नामदार एक कामदार से मुकाबला करना बुरा मानते हैं, खुद का अपमान मानते हैं”

इंटरनेट और मीडिया में मोदी के भाषण रिसर्च का विषय रहे हैं लेकिन अपने बहुत प्रभावी अंदाज के कारण नहीं बल्कि अपने बड़बोलेपन के कारण. इन्हीं रिसर्च रिपोर्टों की मानें तो आंकड़े कुछ इस तरह निकलते हैं:
-अपने 20 मिनट के भाषण में मोदी कम से कम 5356 शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनमें कम से कम 25 बार गुजरात का जिक्र जरूर होता है.
-मोदी द्वारा अब तक दिए कुल 68 भाषणों में 1335 बार गुजरात का जिक्र किया गया है.
- और तो और शुरुआत में तो अपने भाषणों के लिए गलत ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग के लिए भी मोदी की अच्छी-खासी हाय-तौबा मचाई गई. मोदी के कई भाषणों में ऐसी कई ऐतिहासिक बातें कही गईं जिनका इतिहास में या तो कोई जिक्र ही नहीं या वह तथ्य कुछ और था. जैसे:
मोदी के भाषणों के कुछ फैक्चुअल एरर्स
-बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय से संबधित भाषण (बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय है ही नहीं)
-श्यामा प्रसाद मुखर्जी (भाजपा के संस्थापक) को कांग्रेस का बताया
-सिकंदर को बिहार में हारने की बात कही (इतिहास के अनुसार सिकंदर कभी बिहार गया ही नहीं).
-चीन द्वारा अपने जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा के लिए खर्च किए जाने की बात कही जबकि चीन के आंकड़े कहते हैं वह अपनी जीडीपी का मात्र 3 प्रतिशत से कुछ अधिक ही खर्च करता है.


इसके अलावा 
-फैक्ट्स अक्सर गलत
-कोई प्रभावशाली अंदाज नहीं
-विरोधियों पर सीधा निशाना
-अपने तीखे तेवर के लिए हमेशा विरोधियों के निशाने पर
अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों की विशेषताएं
-प्रभावशाली अंदाज
-फैक्ट्स सही
-विरोधियों पर सीधा निशाना निशाना नहीं, चुटीला अंदाज
-विरोधी भी प्रशंसक में शामिल
तुलनात्मक तराजू पर अटल-मोदी
-मोदी के भाषण अपनी और अपने द्वारा गुजरात में किए विकास की तारीफ से ही शुरू और उसी पर खत्म होते हैं जबकि अटल जी के भाषणों में देश और विकास की बातें होती थीं.
-उनके भाषणों से ऐसा लगता है जैसे चुनावी लड़ाई भाजपा से कांग्रेस की नहीं बल्कि मोदी से कांग्रेस की हो.
-अटल जी ने अपने भाषणों में विरोधियों पर कभी सीधी चोट नहीं की. विरोधियों पर कटाक्ष वे भी करते थे लेकिन चुटकी लेने का अंदाज उनका कुछ ऐसा होता था कि अपने ही ऊपर कटाक्ष पर विरोधी हंस पड़ते थे. इसके ठीक विपरीत अपने भाषणों में कभी कांग्रेस को ‘खूनी पंजा’ तो कभी राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कहकर संबोधित करने के लिए नरेंद्र मोदी तीखे विरोध का सामना कर चुके हैं.हाल ही में उमा भारती ने कहा कि अटल जी एक पॉपुलर वक्ता थे इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन मोदी की रैली में लोग उनका भाषण सुनने नहीं बल्कि उन्हें जताने आते हैं कि वे मोदी के साथ हैं. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का मोदी के लिए एक स्टेटमेंट कुछ इस तरह है:
”सशक्त और फौलादी इरादों के साथ-साथ जिसके अंदर संवेदनशीलता है, ऐसा नेतृत्व अगर किसी के पास है तो वह केवल (भाजपा) भारतीय जनता पार्टी के पास है, और इस नेतृत्व का नाम है श्री नरेंद्र कुमार मोदी जिन्हें हम 2014 लोकसभा चुनाव में भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं

Friday, March 28, 2014

मोदी, लहर और भाजपा

ऐसा कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी से प्रधानमंत्री पद  के सबसे प्रबल उम्मीदबार नरेंद्र  मोदी की लेहर पूरे देश में है लेकिन अगर  ऐसा है तो क्या खुद भारतीय जनता पार्टी में इस लेहर का असर दिखाई दे रहा है और अगर पार्टी के बाहर की बात करें तो  गूगल हो या मीडिया हर तरफ मोदी ही छाये हुए है  यही  नही वो जहां भी जाते है उन्हें देखने और सुनने के लिये जनसैलाव उमर पड़ता है।
अगर इन दिनों पार्टी में  भीतरी कलह पर नजर डाले तो शायद मोदी की लेहर पार्टी के अंदर भी काम कर रही है। जिस तरह मोदी पार्टी में सत्ता के पायदान पर तेज़ी से चढ़े है और दूसरे नेता पायदान से नीचे  गिरे है इन नेताओं को मोदी से कोई न कोई शिकायत है।  जसबंत सिंह को बाडमेर का टिकट न देना  या लालकृष्ण आडवाणी को भोपाल की जगह गांधी नगर से ही चुनाव लड़ने पर मजबूर करना हो या फिर मुरली मनोहर जोशी को  वाराणसी की जगह कानपुर से टिकट देने की बात हो ऐसा लगता है सालों से लगे इन वरिस्ठ नेताओं के पार्टी में दिन पूरे हो गए है। जिस तरह नरेंद्र मोदी की पार्टी में पकड़ मजबूत होती जा रही है।  वैसे वैसे इन नेताओं की पार्टी में गिरफ्त कमजोर होती जा रही है।
दूसरी तरफ बचे खुचे बड़े नेता जिनमें राजनाथ सिंह और अरुण जेटली शामिल है जो कि नरेंद्र मोदी का हाथ थाम चुके है।  वो हर कदम पर मोदी के साथ है। लेकिन आडवाणी ने इस लेहर को रोकने की हर मुमकिन चाल चली लेकिन  मोदी के सामने उनकी  एक न चली और उन्हे खामोश ही रहना पड़ा।
पार्टी के अंदर युवा नेताओं और आम कार्यकर्ताओं की बात करें तो वह केवल मोदी का ही नाम ले रहे है उनके अंदर  जो एक नया जोश दिखाई दे रहा है वो शायद मोदी की लेहर का असर है ऐसा लगता है जैसे मोदी ने पार्टी की शाखाओ को एक नया जीवनदान दिया है। अगर मोदी के नेतृत्व में पार्टी के कर्ताधर्ता पार्टी में नई जान फूकना चाहते है तो शायद पूराने नेताओं को किनारे करना गलत नही माना जाएगा।
भाजपा पूरे दस साल से सत्ता से बाहर रही जिसके दौरान वे दो आम चुनाव हार चुके है अगर आम चुनाव जीतना  है तो पार्टी को नए सिरे से संभारने की जरुरत है जैसा कि मोदी करने में लगे हुए है।


Saturday, March 22, 2014

आडवाणी की नाराज़गी और भाजपा....







आम  चुनाव के निकट आते ही  भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर  संकट में घिरती  नज़र आ रही है | भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ  नेता लालकृष्ण आडवाणी इसकी वजह  समझे जा रहे है। किसी न किसी बात पर आडवाणी की नाराज़गी शायद पार्टी  के लिए नई अब नई  मुश्किलें  पैदा कर सकती है। उनके इस रवैये पर अब   विपक्ष भी   खूब चुटकी ले रहे हैं । इससे आम जनता में  भी भाजपा की छवि पर  असर पड़  सकता है क्योंकि देश भर में कांग्रेस विरोधी  लहर  का लाभ अगर किसी को मिलता  दिख  रहा है तो वह है भाजपा है जिसे मोदी अपनी रणनीतियों  के जरिए नये  रूप में ढाल  रहे है। 

पार्टी ने आडवाणी  को  गांधीनगर से  चुनाव लड़ने को कहा, जहां से आडवाणी 1991   से चुनाव जीतते आ रहे है  लेकिन आडवाणी गांधीनगर के बजाय किसी अन्य  सुरक्षित सीट की तलाश में जुटे हैं ।  भाजपा ने उनके नाम का ऐलान भी कर दिया था।  लेकिन वह चुनाव भोपाल से लड़ने के लिये अड़े हुए थे।  जहां शिवराज सिंह चौहान उनके करीबी सहयोगी माने जाते है लेकिन मोदी इस बात पर अड़े है कि आडवाणी को चुनाव गांधीनगर से लड़ना  चाहिए। उन्होंने  आश्वासन  दिया है कि उनको  पूरा सहयोग मिलेगा।  लेकिन आडवाणी का तर्क था कि अगर  मोदी और पार्टी  अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी पसंद की सीटो से चुनाव लड़ सकते है तो  वो अपनी अपनी पसंद से चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते?

यह पहला मौका नहीं है जब आडवाणी इस तरह  कोपभवन में है।  आडवाणी ने राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से इस्तीफा दे चुके थे लेकिन संघ के हस्तक्षेप ने उनको  कोई बड़ा फैसला लेने से रोक लिया था।  अब एक बार फिर आडवाणी मोदी को रोकने के लिए अपना हर दाव
  फ्रन्ट  फुट  खेलकर  आगे  आना चाहते है।  लेकिन आडवाणी ने ऐसा पहली बार  नही किया है।  इससे पहले कई बार वो अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके है। पिछले साल जब पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार  चुना तो उस समय भी आडवाणी को गुस्सा आया। मोदी एक समय आडवाणी के चेले  थे।और शायद आडवाणी को यह बात पची नही कि उनका चेला अब प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल  उम्मीदवार  है।

आडवाणी 7  रेसफोर्स की आखिरी जंग  लड़ने को तैयार है। गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के समय आडवाणी ने उनका बहुत साथ दिया था। यही नहीं २००२ में गोधरा के दंगो  बाद जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी  ने राजधर्म न निभा पाने के लिए मोदी को निशाने पर लिया वहीं आडवाणी के कहने पर मोदी की कुर्सी सलामत रही थीं।आडवाणी इस समय खुद को तन्हा  महसूस कर रहे है। मोदी के नेतृत्व  में बीजेपी  2 72  सीट से  अगर सरकार  नहीं बना पायी तो गठबंधन की   राजनीती  में आडवाणी का ही सपना पूरा होगा।  उनकी मौजूदा नाराज़गी शायद उनकी आखिरी नाराज़गी है।

Saturday, February 22, 2014

क्यों डरबन में हिंसक हुए गांधी ?

दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने जीवन में कभी हिंसक हुए थे? क्या उन्होंने अपनी बात को मनवाने के लिए नैतिक रूप से हिंसा का सहारा नहीं लिया? उनके पुत्र हरिलाल गांधी की पूरी जिंदगी अपने पिता महात्मा गांधी के आदर्शों के खिलाफ विद्रोही तेवरों की वजह से फेमस रही. उनके लिए कभी भी महात्मा गांधी के आदर्श एक प्रेरक शक्ति नहीं रहे बल्कि वह स्वयं इसे अपनी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा रुकावट मानते थे.
पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अद्भुत और चमत्कारिक व्यक्तित्व माना जाता है. सादगी और सहजता के साथ उन्होंने किस तरीके से भारत को सैकड़ों साल पुरानी अंग्रेजी जकड़न से मुक्त कराया. उनके अमिट विचार जीवनभर उनके और समर्थकों के लिए जीवनदायिनी रहे. इसके बावजूद भी वह कहीं ना कहीं पारिवारिक विफलता से क्षुब्ध रहे. महात्मा गांधी जिन्होंने पूरे देश की आत्मा में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाया उन्हें जीवन भर अपने बेटे की सोच को बदलने में कामयाबी नहीं मिल सकी. बल्कि उनके बेटे ने ही विद्रोही होकर अपने पिता को नीचा दिखाने के लिए धर्म परिवर्तन तक कर लिया.
महान पिता के खिलाफ बेटे के विद्रोही तेवर आज भी लोगों को हैरान करते हैं. जब इन दोनों (महात्मा गांधी और हरिलाल) के रिश्तों के बारे में लोग पढ़ते हैं तो उनका विवेक यह सवाल पूछने के लिए विवश करता है कि आखिर क्यों एक बेटा अपने जीते जी, सदैव अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करते हुए, विषवमन करता रहा. आखिर क्या कारण रहे कि हरिलाल गांधी समय के साथ-साथ विद्रोह की गिरफ्त में और अधिक तेजी से जाते रहे और कभी वापस मुड़ने का प्रयास नहीं किया?
गांधी की विफलता तब और बढ़ जाती है जब पिता और पुत्र के बीच पनपती कड़वाहट में महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी पिसती रहती हैं. वैसे कस्तूरबा गांधी की पीड़ा कहीं ना कहीं गांधी परिवार में सबसे ज्यादा थी. गांधी जी के सत्य और अनुशासन के सिद्धांत को तो दुनिया भी सलाम करती है लेकिन गांधी जी का एक ऐसा सिद्धांत है जिस पर दुनिया कभी एकमत नहीं हो पाई है और वह है ब्रह्मचर्य का सिद्धांत. कई लोग मानते हैं कि गांधी जी का अपने जीवन में ब्रह्मचर्य को अपनाने का फैसला ‘बा’ यानि कस्तूरबा गांधी के लिए बेहद कठिन और पीड़ादायक रहा. यही नहीं उनके कड़े नियम उनके बच्चों सहित उनकी पत्नी के लिए पीड़ादायक थे. पत्नी होने की वजह से कस्तूरबा गांधी ने इसका कभी विरोध नहीं किया लेकिन उनके बच्चों में हरिलाल ने इसका पुरजोर विरोध किया
महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा गांधी के बारे में कुछ अनछुए पहलू उजागर किए थे जिसमें से एक घटना कुछ यूं है………….
बकौल महात्मा गांधी “जब मैं दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रहता था. उस समय मेरे साथ एक क्रिश्चियन क्लर्क भी रहता था जिसका जन्म अछूत परिवार में हुआ था. जिस घर में मैं रहता था वह घर पूरी तरह से वेस्टर्न मॉडल पर आधारित था. इसमें हर रूम के लिए अलग-अलग बाथरूम थे जिसकी गंदगी नौकर साफ करते थे. महात्मा गांधी के अनुसार तब खुद और उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी ने अपनी-अपनी गंदगी साफ की. लेकिन क्रिश्चियन क्लर्क चूंकि वहां नया व्यक्ति था इसलिए स्वयं महात्मा गांधी और उनकी पत्नी उस क्लर्क के बेडरूम तथा लैट्रिन पॉट की भी साफ-सफाई किया करते थे. उसी दौरान सफाई करते समय कस्तूरबा और मोहनदास गंदगी पर गिर गए थे. तब गांधी, कस्तूरबा को उस गंदगी से खींचकर बाहर लाए और इसी बीच उनके दर्मियान झड़प भी हुई. आवेश में महात्मा ने ‘बा’ को छोड़ देने की बात की हालांकि बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ.